Sunday, 12 March 2017

होली और होली के गाने..

होली का दिन हो और अपनी हिंदी फिल्मो के गाने न बजे ऐसा कैसे हो सकता है.. रंग बरसे भीगे चुनर वाली और आज ना छोड़ेंगे बस हमजोली.. जैसे गाने जब तक न बजे लगता ही नहीं कि होली आ गई है. इन गानों का बजना और लोगों का थिरकना जैसे किसी परंपरा की तरह हो गया है. होली के त्योहार का उत्साह बढ़ाने में बॉलीवुड ने हमारा खूब साथ दिया है. 1958 से लेकर आज तक फिल्मों में होली के गीत फिल्माएं जाते हैं और वे सुर्खियां भी बटोरते हैं.




होली पर गानों का इतिहास काफी पुराना है. पहले के समय में लोग होली पर 'फाग' गाते थे. इसके साथ ही बड़े सारे गाने राधा-कृष्ण की होली को दर्शाने वाले होते थे. जैसे "आज ब्रिज में होली  रे रसिया..". 1981 में आई फिल्म सिलसिला का 'रंग बरसे भीगे चुनर वाली..' होली पर गाये और बजाये जाने वाले गानों में सबसे लोकप्रिय है. असल में ये गाना काफी पुराना है जिसकी जड़े अवध में गाये जाने वाले एक तरह के फाग में है. अभिताभ बच्चन जी खुद ही कई बार बताया कि ये गाना उन्होंने सबसे पहले अपनी पिता जी, हरिवंश राय बच्चन जी से सुना था. फिल्म में इस गाने का रूप थोड़ा बदला पर मिठास और भावनाओ में कमी नही थी. 2003 में आई फिल्म बाग़बान में अमिताभ बच्चन और हेमा मालिनी पर फिल्माए गए 'गीत होली खेले रघुवीरा..' ने भी लोगों के दिलों को छू लिया. ये गाना भी एक पुराने फ़ाग का ही थोड़ा आधुनिकीकरण था. मुझे याद है एक बार बचपन में मैं अपनी मासी के यहाँ होली पर थी तो गांव के सारे बड़े लोग एक साथ मिलकर ये गीत 'होली खेले रघुवीरा..' ही गा रहे थे. पहले कहा थे ये आज के बाजे, बस ढोलक और मंजीरे थे और उनके साथ ही ये गाना इतना मधुर था कि किसी और यन्त्र की जरूरत नही थी. मुझे उस समय से ये गाना पसंद है.

अब इस ब्लॉग की मुख्य बात पर आती हूं. क्या आपको भी लगता है की समय के साथ होली के गानों की मिठास कम हो गई है? उनमे वो बात नही रही जो हमारे बचपन के गानों में थी? मुझे तो कम से कम यही लगता है. पुराने गानों से शुरू करू तो 1958 में आई फिल्म मदर इंडिया का 'होली आई रे कन्हाई..' किसे याद नहीं होगा. ये मेरा सबसे पसंदीदा होली का गाना है. इसके अलावा वी शांताराम की फिल्म नवरंग का गीत 'जा रे हट नटखट..' आज भी झूमने पर मजबूर कर देता है. 1970 में आई राजेश खन्ना और आशा पारेख स्टारर फिल्म कटी पंतग का गीत 'आज न छोडेंग़े हमजोली..' विधवा कुप्रथा के न केवल खिलाफ था, बल्कि प्रेम का असली प्रतीक भी बन गया था. आज भी साल 1975 में आई फिल्म शोले के गीत 'होली के दिन दिल खिल जाते हैं..' होली पर जरूर बजता है.1982 की फिल्म राजपूत का 'भागी रे भागी ब्रिज की बाला..' भी होली का एक मधुर गीत है. 1982 की ही फिल्म नदिया के पार का गाना "जोगी जी.." क्या खूब गाना है. 1993 में आई फिल्म डर का गाना 'अंग से अंग लगाना सजन हमें ऐसे रंग लगाना..' किसे याद नहीं होगा!

इस के बाद के सारे होली के गानों में मुझे कुछ ना कुछ कम लगती है. 2003 की फिल्म बाग़बान को इससे अलग कहूँगी पर बाकी सब गाने अज़ीब सा मॉर्डन टच लिए हुए है. ये ब्लॉग लिखते हुए पड़ोस में अभी ही आई फिल्म जॉली LLB 2 का गाना "गो पागल.." चल रहा है. गाना तो होली का ही है पर मुझे झूमने पर मजबूर नही करता. और ऐसा ही हाल 2013 में आई ये जवानी है दीवानी का गाना 'बलम पिचकारी' का भी है. शायद मुझे इनके चित्रण के परेशानी है या फिर गाने के शब्दो से. ऐसे गाने ही आज के युवाओं को हिम्मत देते है हद से आगे बढ़ कर होली के नाम पर किसी को परेशान करने का. खैर ये मेरी परेशानी है कि नए गाने मुझे कम पसंद आते है. पर वो फाग गाने वाले लोगो की टोलिया जब मोहल्लो में निकलती थी तो नज़ारा कुछ और ही होता था. झांझ,मृदंग और ढपली के बजने से चारों ओर उमंग ही उमंग होता था. लडकियां घर की छतो से ही इन टोलियो पर रंग डालती थी. और ये थोड़ी से मर्यादित मस्ती ही मुझे पसंद थी और आज भी पसंद है.

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