Friday, 10 February 2017

कुछ बीज नए तो कुछ पुराने..

हमारे घरो में ये आम बात है कि छोटे बच्चे सोने से पहले कहानी या लोरिया सुनते है अपनी माँ से. मेरा घर भी कुछ अलग नही है. बस मेरे घर में हम दोनों पति पत्नी मिलकर ये काम करते है. मुझे गाने का शौक है और अच्छी बात ये है कि मेरे पतिदेव को भी यही कीड़ा है. हमारा झुकाव पुराने फ़िल्मी गानों की तरफ ज्यादा है. पर सबसे ज्यादा जो हमें पसंद है वो है लोक गीत जिन्हें हम आम भाषा में folk songs बोलते है. अवध से आने की वजह से ये लोक गीत अच्छे से रचे बसे है हमारी सोंच में. हमारे यहाँ शादी या किसी और शुभ काम में लोक गीत गाना आम है. मेरी माँ और सासू माँ दोनों ही अच्छा गाती है. मुझे बड़ा अच्छा लगता है जब हम अपना इतिहास गीतों के माध्यम से याद करते है. और हमारे यहाँ किसी देवी या देव की पूजा भी बिना गीतों के पूरी नही होती. पतिदेव के ननिहाल में सब लोग ही अच्छा गाते है जिसका काफी असर है उनके ऊपर. मुझे तो स्कूल के समय से ही अच्छा लगता था गाना. इन्ही वजहों से हम दोनों को ही कई लोक गीत आते है. 



वैसे आज के ज़माने में लोग कजरी, चैती, दादरा, बन्ना जैसे लोक गीत ना सुनते है और ना ही सुनाते है. पर हमने अपने घर में ये विरासत बनाए रखने का सोचा है. हम अपने बेटे को फिल्मो की लोरियाँ नही, अपने अवधी लोक गीत और भजन सुनाते है सोते समय. कभी कुछ नया करने का मन हुआ तो रामचरितमानस की चौपाइयां सुना देते है. हम दोनों,पति पत्नी,के परिवारों के पूजा पाठ काफी मायने रखता आया है तो हम भी सीख गए चालीसाएं और श्लोक. तो कभी कभी रोज पूजा करते समय जो श्लोक पढ़े जाते है वो भी सुना देते है अपने बेटे को. पर सबसे अच्छी बात जो है वो है हमारे बेटे का झुकाव इन 'अलग' से गानों की ओर. पिछले दो सालो में वो भी काफी चौपाइयां,श्लोक और भजन सीख गया है. ऐसा नही है की वो अंग्रेजी की rhymes या poems नही सीख रहा. उसमे भी आगे है. नए फ़िल्मी गाने भी रटे हुए है उसे. गाना शुरू होने से पहले ही बता देता है कौन सा है. पर सोते समय वो किस चीज की फरमाइस करेगा ये बस उसके मन पर है. जो कहता है वो हम सुना देते है.



समय बदल रहा है बड़ी ही तेज़ी से. जो हमने अपने बचपन में सीखा या किआ वो हमारे बच्चे शायद ही कर पाए. शायद ही वो खेतो में बैठ कर खरबूजे और पेड़ो पर चढ़ कर अपनी पसंद का आम तोड़ पाएंगे. पंखे और टोकरिया बना पाएंगे. लकड़ी की तख्ती (स्लेट) देख पाएंगे और सेठे की कलम (पेन) भी हो सकती है कभी सोच पाएंगे. पर हम माता पिता के पास जो रह गया है वो तो दे ही सकते है हम अपने बच्चो को. जैसे ये हमारे अवधी गाने और रामचरितमानस की चौपाइयां. हमारे संस्कार और परिवार के गुण हम ही सिखा सकते है उन्हें. वो किसी स्कूल और एक्स्ट्रा क्लास में नही मिल पाएनेगे. तो हम अपने बेटे की परवरिश में कुछ बीज नए तो कुछ पुराने भी डाल रहे है. हम अंग्रेजी से पहले हिंदी सिखा रहे है उसे. पिज़्ज़ा से पहले कढ़ी-चावल का स्वाद दिला रहे है उसे. बाकी नए ज़माने की चीजे तो वो खुद ही सीख लेगा जैसे हमने सीख ली थी!

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